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इंटेलिजेंस रिपोर्ट : भीम सेना को नक्सली एवं वामपंथी दलों का भारी समर्थन, जानिए कौन है वामपंथी.

🚩 इंटेलिजेंस रिपोर्ट : भीम सेना को नक्सली एवं वामपंथी दलों का भारी समर्थन, जानिए कौन है वामपंथी🚩मई 29, 2017 https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1904566656424449&substory_index=0&id=1786207144927068🚩 उत्तर प्रदेश सहारनपुर में कई दिनों से बवाल चल रही है और जातीय हिंसा हुई, उसके लिए जिम्मेदार भीम आर्मी मानी जा रही है ।🚩भीम आर्मी का संस्थापक चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण है। खुद को 'रावण' की उपाधि से पुकारा जाना पसंद करता है ये शख्स !!🚩रिपोट अनुसार भीम आर्मी को विभिन्न दलों के नेताओं के अलावा हवाला के जरिये भी फंडिंग की गई। पिछले दो महीने में भीम आर्मी के एकाउंट में एकाएक 40-50 लाख रुपये ट्रांसफर हुए हैं।🚩नौ मई को #भीम आर्मी के कार्यकर्ताओं ने सहारनपुर में आठ स्थानों पर पुलिस पर पथराव किया था।🚩श्री हनुमानजी की फोटो पर थूके और जूते फैंके,इसमें भी #भीम आर्मी के सदस्य नजर आये ।🚩इंटेलिजेंस की रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि कई #वामपंथी दल भीम सेना के संयोजक चंद्रशेखर के समर्थन में थे और उससे लगातार संपर्क में बने हुए थे और नक्सलियों से संबंध होने की बात का खुलासा …
🚩 महाराणा प्रताप जयंती 28 मई

🚩https://youtu.be/jns273veoNM

🚩https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1903486749865773&substory_index=0&id=1786207144927068

🚩महाराणा प्रतापका परिचय

🚩जिनका नाम लेकर दिनका शुभारंभ करे, ऐसे नामोंमें एक हैं, #महाराणा प्रताप । उनका नाम उन पराक्रमी राजाओंकी सूचिमें सुवर्णाक्षरोंमें लिखा गया है, जो देश, धर्म, संस्कृति तथा इस देशकी स्वतंत्रताकी रक्षा हेतु जीवनभर जूझते रहे ! उनकी वीरताकी पवित्र स्मृतिको यह विनम्र अभिवादन  है ।

🚩मेवाडके महान राजा, #महाराणा प्रताप सिंहका नाम कौन नहीं जानता ? भारतके इतिहासमें यह नाम वीरता, पराक्रम, त्याग तथा देशभक्ति जैसी विशेषताओं हेतु निरंतर प्रेरणादाई रहा है । मेवाडके सिसोदिया परिवारमें जन्मे अनेक पराक्रमी योद्धा, जैसे बाप्पा रावल, राणा हमीर, राणा संगको ‘राणा’ यह उपाधि दी गई; अपितु ‘ #महाराणा ’ उपाधिसे  केवल प्रताप सिंहको सम्मानित किया गया ।


🚩#महाराणा प्रतापका बचपन

🚩#महाराणा प्रतापका जन्म वर्ष 1540 में हुआ । मेवाडके राणा उदय सिंह, द्वितीय, के ३३ बच्चे थे । उनमें प्रताप सिंह सबसे बडे थे । स्वाभिमान तथा धार्मिक …

ग्रीष्म में शक्तिवर्धक

ग्रीष्म में शक्तिवर्धक - ठंडे पानी में जौ अथवा चने का सत्तू, मिश्री व घी मिलाकर पीयें । सम्पूर्ण ग्रीष्म में शक्ति बनी रहेगी ।

मुँह के छाले व आँखों की जलन में - एक चम्मच (लगभग 5 ग्राम) त्रिफला चूर्ण सुबह मिट्टी के बर्तन में पानी में भिगो दें, शाम को छानकर पीयें । शाम को उसी त्रिफला चूर्ण में पानी मिलाकर रखें, सुबह पी लें । इसी पानी से आँखें धोयें । छाले व जलन कुछ ही समय में गायब हो जायेंगे ।

घमौरियाँ दूर करने हेतु - 10 ग्राम नीम के फूल व थोड़ी मिश्री पीसकर, पानी में मिलाके पीने से घमौरियाँ दूर हो जायेंगी ।

हृदय व मस्तिष्क की पुष्टि हेतु - भोजन के बीच में आँवले का 30-35 ग्राम रस पानी में मिलाकर 21 दिन पीने से हृदय और मस्तिष्क खूब मजबूत हो जाता है ।

पुराने बुखार में - तुलसी के ताजे पत्ते 6, काली मिर्च 2 और मिश्री 10 ग्राम ये तीनों पानी के साथ पीसकर घोल बनाके बीमार व्यक्ति को पिला दें । कितना भी पुराना बुखार हो, कुछ ही दिन यह प्रयोग करने से सदा के लिए मिट जायेगा ।

MAA KI MAMTA

शाम को रसोई मेँ माँ खाना बना रही थी. तभी उसका छोटा लडका उसके पास आया.. और एक कागज देता है. जिसमेँ कुछ लिखा होता है. माँ वो कागज पढती है.. जिसमेँ लिखा होता हे…..
1- तेरे लिए दुकान से सामान लाया उस के लिए........रुपये 05.00
2-घास काटने के.......रुपये 50.00
3- इस सप्ताह का आपका रुम साफ करने के.......रुपये 10.00
4- जब तु कही बाहर जाती थी तब, छोटे भाई को सचेतने के.........रुपये 15.00
5- कचरा बाहर डालने के ........रुपये 05.00
6- बगीचा साफ करने और घास उठाने के.........रुपये 15.00
7- अच्छा परिणाम लाने के लिए........... रुपये 50.00 कुल.......रुपये 150.00 अच्छा,

माँ वहा खडे लडके का देखती है.......... बाद माँ पेन उठाती है… और उसी लिखे कागज को घुमाती है और उसी तरह लिखती है...
1- जब तु मेरे पेट मेँ था तब मैने तुझे
9 महीने कोख मेँ रखा…….उसका एक भी पैसा नही..
2- जब तु बीमार था... पुरी रात तेरे पास बेठी रही और तेरी सेवा, भगवान से प्रार्थना करती रही.......उसका एक भी पैसा नही.
3- तुने बहुत नयी वस्तु सीखी उसके लिए मेरे आँसु गिराये....उसका भी एक पैसा नही.
4- तेरे खिलोने , कपडे, खाया-पिलाया औ…

घटक तोड़ जल जल में समाया जल प्रकाश आकाश में छाया का मतलब क्या है ?

जैसे कबीर ने कहा कुम्ब में जल, जल में कुम्ब, बाहर भीतर पानी ,घड़े में पानी, पानी में घड़ा, है तो बाहर भीतर, फिर भी घड़े की आकृति है तब तक ये घड़े का पानी और ये सरोवर का पानी, और घड़ा फूटा तो घड़ा घड़ा नहीं रहा सरोवर बन गया, तो फिर उसमे जो चाँद दिखेगा सूर्य दिखेगा घड़े भर का नहीं दिखेगा सरोवर भर का दिखेगा, ऐसे ही देह को मै माना तो ये घड़ा था और गुरु की कृपा से मै देह नहीं हु ,मै मन नहीं इन्द्रिय नहीं, बुद्धि नहीं ,मै मै में वृसान्ति पी, तो अणू विभु हो गया,जीवाणु फूट गया जैसे फुग्गे के अन्दर आकाश होता है बहार भी आकाश होता है फुग्गा फूटता है तो फूग्गे का आकाश महाकाश से मिल गया ऐसे ही घड़ा टूट गया तो घड़े का पानी और सरोवर का पानी एक हो गया.

ध्यान के समय कैसा भाव होना चाहिए ? करता भाव या द्रष्टा भाव ?

पूज्य बापूजी : भाव कोई न हो ...शांत ...न करता न अकर्ता , अकर्ता हूँ तो भी एक भाव है करता हूँ तो भी एक भाव है ..भाव तो भाव है भाव मन शरीर, साधक मतलब शरीर से भी परे जाए ..... भाव कुभाव प्रभाव सुभाव सब माया मात्र है ..माया मात्र इदं सर्वं ... ॐ शांति ...सभी भावों का आधार जो है उस परमात्मा में ये भाव आते जाते हैं और उसको जानने वाला नित्य परमात्मा रहते हैं ..ॐ शांति ॐ आनंद ...समता भाव समत्व योगं उच्चय्ते ...समता भाव सबसे ऊँचा योग है

माया का स्वरुप क्या और कैसे बचें

मा या , जो दिखे और टिके नहीं ये माया का स्वरुप है जो बदल जाता है .... जो दीखता है वो स्वप्ना है और परमात्मा अपना है परमात्मा प्राप्ति की इच्छा से माया से बचता है , भगवान की सरन ह्रदय पूर्वक जाने से माया से बचता है

यदि कोई दीक्षित साधक ,आवेश में आकर ,किसी कारण के बिना, दूसरे साधक को श्राप दे तो वो फलित होगा ?

श्राप देना, देने वाले के लिए खतरे से खाली नहीं है । श्राप देना अपनी तपस्या नाश करना है । आवेश में जो श्राप दे देते हैं उनके श्राप में दम भी नहीं होता । जितना दमदार हो और हमने गलती की है, वो श्राप दे चाहे न दे, थोड़ा सा उसके हृदय में झटका भी लग गया, हमारे नाराजी का, तो हमको हानि हो जाती है और थोड़ा सा हमारे लिए उनके हृदय में सद्‍भाव भी आ गया, तो हमको बड़ा फायदा मिलता है ।

केवल हम उनकी दृष्टि के सामने आयें और उनके हृदय में सद्‍भाव आया तो हम को बहुत कुछ मिल जाता है । महापुरुषों के हृदय में तो सद्‍भाव स्वाभाविक होता रहता है लेकिन श्राप तो उनको कभी-कभार कहीं आता होगा अथवा दुर्वासा अवतार कोई श्राप देकर भी लोगो को मोड़ने की कोई लीला हुई तो अलग बात है ।

जरा-जरा बात में गुस्सा होकर जो श्राप देते है और दम मारते है तो आप उस समय थोड़े शांत और निर्भीक रहो ।

नारायण नारायण !

मुक्‍ति और आत्‍मसाक्षात्‍कार एक ही है या अलग-अलग है

मुक्‍त का मतलब है बंधनों से मुक्‍त होना और दुखों से मुक्‍त होना । दुखों से मुक्‍त.... आत्‍मसाक्षात्‍कार के बिना हुआ नहीं जाता । परमात्‍मा की प्राप्‍ति कहो, मुक्‍ति कहो एक ही बात है । मुक्‍ति भी पांच प्रकार की होती है – यहां से मर गये, स्‍वर्ग में चले गये, इसको स्‍वर्गीय मुक्‍ति कहते है । ठाकुरजी का भजन करके ठाकुरजी के देश में चले गये वो सायुज्‍य मुक्‍ति होती है । ठाकुरजी के नजदीक रहे तो सामीप्‍य मुक्‍ति । और नजदीक हो गये मंत्री की नाईं........ सायुज्‍य मुक्‍ति, सामीप्‍य मुक्‍ति....... लेकिन वास्‍तविक में पूर्ण मुक्‍ति होती है कि जिसमें ठाकुरजी जिस आत्‍मा में, मैं रूप में जगे है उसमें अपने आप को जानना.... ये जीवनमुक्‍ति होती है .... जीते-जी यहां होती है । दूसरी मुक्‍ति मरने के बाद होती है .... स्‍वर्गीय मुक्‍ति, सालोक्‍य मुक्‍ति, सामीप्‍य मुक्‍ति, सायुज्‍य मुक्‍ति, सारूप्‍य मुक्‍ति । इष्‍ट के लोक में रहना सालोक्‍य मुक्‍ति है । उनका चपरासी अथवा द्वारपाल जितनी नजदीकी लाना सायुज्‍य मुक्‍ति है । सामीप्‍य मुक्‍ति .... उनका खास मंत्री अथवा भाई की बराबरी । जैसे रहते है राजा का भाई ऐसे हो जाना…

भगवान ने जगत क्‍यों बनाया ?

ये संसार भगवान ने पुजवाने के लिये नहीं बनाया, जैसे नेता वोट बैंक के लिये अपने एरिया में घूमता है ऐसे भगवान सृष्‍टि करके अवतार लेकर वोट बैंक के लिये नहीं आते अथवा वोट बैंक के लिये भगवान ने ये सृष्‍टि नहीं बनाई । भगवान ने आपको गुलाम बनाने के लिये भी सृष्‍टि नहीं बनार्इ । भगवान ने आपको अपने अलौकिक आनंद, माधुर्य, ज्ञान और प्रेमाभक्‍ति के द्वारा अपने से मिलने के लिये सृष्‍टि बनाई । भगवान परम प्रेमास्‍पद है । बिछड़े हुए जीव अपने स्‍वरूप से मिले इसलिये सृष्‍टि है । वो सृष्‍टि में अनुकूलता देकर, योग्‍यता देकर आपको उदार बनाता है कि इस योग्‍यता का आप ‘‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’’ सदुपयोग करो और प्रतिकूलता, विघ्‍न-बाधा देकर आपको सावधान करता है कि संसार तुम्‍हारा घर नहीं है । ये एक पाठशाला है, यहां से आप यात्रा करके मुझ परमेश्‍वर से मिलने आये हो । इसलिये दुख भी भेजता है । दुख सदा नहीं रहता और सुख भी सदा नहीं रहता । धरती का कोई व्‍यक्‍ति सुख को टिकाये रखे, संभव ही नहीं । दुख को टिकाये रखो, संभव नहीं है क्‍योंकि उसकी व्‍यवस्‍था है । सुख भी आकर तुम्‍हे उदार और परोपकारी बनाने का संदेश देता है । आप सुख…

काम विकार जब जब आता है तो अच्छे तरीके से गिरा देता है | इससे बचने का उपाय बताये |

सर्वांग आसन करो और मूलबंध करो सर्वांग आसन करके ताकि वो जो वीर्य बनता है वो ऊपर आये मस्तक में शरीर में और मजबूती करे |
प्राणायाम कस के करो सवा मिनट अंदर श्वास रोके और चालीस सेकण्ड बाहर श्वास रोके. और आवले के चूर्ण में २० प्रतिशत हल्दी मिलाकर ३-३ ग्राम सेवन करो .युवाधन पुस्तक पढ़ा करो |
शादी नहीं किया है तो पहले ईश्वर प्राप्ति करके फिर संसार में जाओ अथवा तो खाली होकर मरो फिर जन्मो तुम्हारी मर्जी की बात है |

मृत्‍यु के समय साक्षात्‍कार हो सकता है लेकिन जब आत्‍मा शरीर से अलग होने लगती है तो मूर्छा आ जाती है फिर साक्षात्‍कार कैसे होगा

देखो जिनको मूर्छा आ जाती है उनको साक्षात्‍कार की रूचि नहीं होती तो मूर्छा आ जायेगी । जिनको साक्षात्‍कार की रूचि होती है उनको मूर्छा तो क्‍या ? (मूर्छा आ भी गई थोड़ी देर के लिये तो वो विश्राम है, विश्राम के बाद ....... जैसे आप पढ़ते पढ़ते सो गये तो फिर जब जगते है तो पढ़ाई याद आयेगी ना........ बात करते-करते, चिंतन करते-करते सो गये.... थकान थी..... विश्राम मिला फिर...... वही दशा होगी, सोने के पहले जैसा चिंतन था, चित्‍त था, सोने के बाद आ जायेगा, इसमें मूर्छा क्‍या बिगाड़ लेगी हमारा ) भगवान का सत्‍संग सुना है, भगवान को अपना आत्‍मरूप मानते है, भगवान के नाम का जप करते है, गुरू से दीक्षा-शिक्षा लिया है तो मूर्छा भी आ गई, थकान में नींद भी आ गई तो वो निगुरी क्‍या बिगाड़ लेगी । घर में कुतिया आ गई तो मालिक हो गई क्‍या ? घर में कुतिया आ गई तो मालिक हो जायेगी क्‍या रसोड़े की ? चलो डरो मत........

गलत प्रणाम से कुष्ठ रोग होता है !!!

१.मंदिर में ठाकुर को अपने बाये रखकर प्रणाम करना चाहिए
२. हमेशा पंचांग प्रणाम करना चाहिए
३. पूरा लेट कर प्रणाम करना हो तो कमर से ऊपर के वस्त्र पूरे उतार देने चाहिए
४. महिला क्योंकि ऊपर के वस्त्र नहीं उतार सकती इसलिए महिला द्वारा लेटकर प्रणाम नहीं करना चाहिए
५. पुरे वस्त्र पहन कर जो पूरा लेटकर प्रणाम करता है उसे सात जन्म तक कुष्ठ रोगी होना पड़ता है
वराह पूरण में ऐसा लिखा है-
वस्त्र आवृत देहास्तु यो नरः प्रनमेत मम
श्वित्री सा जयते मूर्ख सप्त जन्मनी भामिनी
६. गुरुदेव को सामने से
७. नदी को एवं सवारी को उधर से प्रणाम करना चाहिए, जिधर से वह आ रही हो
८. मंदिर के पीछे
९. भोजन करते समय
१०. शयन के समय
ठाकुर, गुरु, संत, वरिष्ठ या किसी को भी प्रणाम नहीं करना चाहिए
श्री हरिभक्ति विलास ग्रन्थ से संकलित

Udaypur Satsang 15 Oct 2006 Asaram ji Bapu 8

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SANT SHREE ASARAM JI BAPU- yoag leela_PART_16.flv

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अभिभावकों, बच्चोंको अनुशासित करनेके लिए प्रतिदिन निम्न कृति करें !

बच्चे अनुकरणप्रिय होते हैं । जन्मसे ही वे अपने मां-पिताका सतत निरीक्षण करते हैं । इस कारण अधिकांश बच्चोंके चलने, बोलने एवं आचरण करनेका पद्धति अपने माता-पिताके समान होती है । इस कारण माता-पिता अपने व्यवहार एवं बोलनेकी ओर अधिक ध्यान दें तथा स्वयंके दोष दूर करनेका प्रयास करें ।
१ . प्रतिदिन प्रात:उठते ही ईश्वरको नमस्कार कर प्राणायाम करना एवं कुछ समय ध्यानधारणा करें ।

२. स्नानके उपरांत ईश्वरको, मां-पिताको एवं ज्येष्ठोंको नमस्कार करें  तथा सदैव ज्येष्ठों, गुरुजनों तथा शिक्षकोंके मिलनेपर उन्हें नमस्कार करें ।

३. प्रतिदिन सूर्यनमस्कार करें एवं आसन तथा व्यायाम करें ।

४. दूध अथवा चाय पीनेके उपरांत अपना बर्तन धोकर रखें ।

५. बाहरसे आनेके बाद पादत्राण (जूते-चप्पल) उतारकर पैर धोकर घरके भीतरप्रवेश करें ।

६. फल खानेके उपरांत छिलका घरमें रखे कूडेदानमें फेवेंâ ।

७. कुछ भी खाने अथवा भोजनसे पूर्व हाथ धोएं ।

८. अन्नदेवतासे प्रार्थना कर ही भोजन प्रारंभ करें, वैसे ही भोजनके उपरांत दांत ब्रशसे स्वच्छ करें ।

९. पढनेके उपरांत पुस्तक उचित स्थानपर रखें तथी खेलनेके उपरांत बच्चे अपने खिलौने इत्यादि उचित स्थानपर रखें ।

१०.

विद्यार्थियोंमें आत्मविश्वास जागृत करनेकी आवश्यकता !

कोई भी निर्णय लेनेसे पूर्व स्वकीयों अथवा वरिष्ठोंसे उस विषयके बारेमें पूछना, यह मनुष्यप्राणीका स्वभाव होना             ‘प्रतिदिन होनेवाली बच्चोंकी आत्महत्या आज राज्यस्तरपर चिंताका विषय बन गया है । प्रतिदिन इस संख्यामें निरंतर वृद्धि हो रही है । इससे पूर्व छोटे बच्चोंकी आत्महत्याके प्रसंग नहीं हुए; परंतु इस प्रकार आत्महत्याकी श्रृंखला-सी बन जानेकी यह पहली घटना है । अल्पायुमें बच्चोंका आत्महत्या जैसा निर्णय लेना, यह जितना आश्चर्यजनक है, उतना ही उन्हें यह निर्णय लेनेको बाध्य करनेवाले एवं वैसी परिस्थिति निर्माण करनेवाले घटकोंपर विचार करना भी आवश्यक है । जीवनका अर्थ क्या है, जीना वैâसे है तथा जीवनमें घटनेवाले प्रसंगोंका सामना वैâसे करना है, जीवनके निर्णय वैâसे लेने हैं । सामाजिक तथा पारिवारिक भान वैâसे रखना है, यह सारा भाग विद्यार्थी अवस्थासे तारुण्य अवस्थातक मनुष्य सीखता है । इस कालमें होनेवाले अनुभवोंसे ही वह आगे मार्गक्रमण करता है । इस संपूर्ण यात्रामें उसे आवश्यकता होती है किसी योग्य मार्गदर्शनकी । उसकी भावनाओंको समझनेवाले सहयोगियोंकी । वह सहयोगी कोई भी हो । माता-पिता, मित्र-सखी, शिक्षक…

विद्यार्थियोंका शिक्षकोंके प्रति भाव कैसा होना चाहिए ?

प्राचीन कालमें शिक्षकोंको गुरु अथवा आचार्य संबोधित करते थे । गुरु-शिष्य परंपरा  हिंदु संस्कृतिकी अनमोल विशेषता है । गुरुपूर्णिमा अर्थात् गुरुके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनेका दिन ।  जैसे गुरु शिष्यको ब्रह्मज्ञान देते हैं, वैसे ही शिक्षक उनके पास जो विद्यारूपी अमूल्य धन है, उसे विद्यार्थियोंको देते हैं । इसी कारण उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु शिक्षकदिन गुरुपूर्णिमाके दिन मनाएं । गुरुपूर्णिमाको शिक्षकदिन मनानेके कारण अपनी संस्कृतिका जतन होगा ।

१. जीवनका योग्य दिशादर्शक !

         शिक्षक हमारे जीवनका अज्ञान दूर कर व्यवहारके अनेक विषयोंका ज्ञान देते हैं । हमारे  जीवनाके योग्य दिशादर्शक शिक्षक ही हैं । हमें उनका प्रतिदिन आदर ही करना चाहिए ।

२. शिक्षकके  दंड  देनेका  कल्याणकारी हेतू !       जीवनमें हमें अयोग्य काम करना टालना चाहिए । आदर्श आचरण करें, इस हेतुसे ही शिक्षक हमें माताके समान दंड देते हैं । उनका विचार यह होता है कि हम आदर्श बनें । अज्ञानके कारण उनके द्वारा दंडित करनेपर हमें क्रोध आता है; परंतु उनकी कृतिका उद्देश्य हमें समझना चाहिए । जिस-प्रकार कुम्हार कच्चे मटकेको पक्का बनानेके …

बच्चोंपर संस्कार कबसे करें ?

शिशुके जन्मसे पूर्वगर्भपर उचित संस्कार कैसे करें ? : मां-पिता एवं परिवारके व्यक्तियोंके सात्त्विक विचारोंका भी गर्भके मनपर प्रभाव पडता है । इस सात्त्विक वातावरणका शिशुके शारीरिक एवं मानसिक विकासपर अच्छा परिणाम होता है । संत वाङ्मय, विनयपत्रिका, श्रीरामचरितमानस, श्रीमद्भगवद्गीता इत्यादिका वाचन करें । संतोंके, देवताओंके चरित्र पढें । मनमें क्षोभ हो ऐसा वाङ्मय, रहस्यकथा न पढें एवं वाहिनियोंपर मारामारी, हत्या जैसे वीभत्स, दु:ख एवं क्रोध निर्माण करनेवाले दृश्य न देखें । गर्भवती स्त्रीको जिस देवता, संत अथवा वीरपुरुषके गुण अपने शिशुमें लानेकी इच्छा हो, उनकी मूर्ति, छायाचित्र सामने रखकर उनका ध्यान करें । ध्यानके पश्चात गर्भवती स्त्री कुछ आवश्यक स्वयंसूचनाएं भी दे सकती है । गर्भवती स्त्री नामजप करे । माताके आहार-विहार, विचार तथा इच्छाका गर्भपर भी परिणाम होता है । गर्भवतीके उत्तम आचार-विचारोंकी छाप गर्भके मनपर भी उभरती है । अनुभवगर्भावस्थामें अखंड नामजप करनेसे प्रसूतिके समय कष्ट न होना तथा तेजस (गर्भस्थ शिशु)पर भी नामजपका संस्कार होना : तेजस गर्भमें था, तब आधुनिक चिकित्सकने मुझे विश्राम करनेका प…

संस्कारका अर्थ क्या है ?

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संस्कार - सम् अर्थात् सम्यक अर्थात् अच्छे, अच्छी

कार - अर्थात् कार्य, कृति
           प्रत्येक कार्य ही अच्छा अर्थात् संस्कारयुक्त होना चाहिए । उदा. केला खाकर हम छिलका फेंक देते हैं यह कृत्य है । केला खाकर छिलका कूडेदानमें फेंकना यह प्रकृति । केला खाकर छिलका सडकपर फेंक देना, यह विकृति । अन्य व्यक्तिद्वारा रास्तेपर फेंका हुआ छिलका कूडेदानमें फेकना यह संस्कृति ।
           भूख लगनेके उपरांत खाना यह प्रकृति । अन्य व्यक्तिके लिए रखे खानेका भाग भी स्वयं खा जाना यह विकृति एवं अतिथि तथा घरके सभी सदस्य अर्थात नौकर, गाय इत्यादिका खाना हुआ अथवा नहीं यह देखकर बादमें भगवानको नैवेद्य समर्पित कर प्रसाद समझकर खाना यह संस्कृति ।
           मनन (चिंतन) कर सर्वांगीण विचार कर कृति करनेवाला अर्थात्  मानव । विचार एवं कृति अच्छी होनेके लिए संस्कारोंकी आवश्यकता है । भारतीय शास्त्रके अनुसार प्रत्येक कृति ही संस्कारयुक्त होनी चाहिए ।
           संस्कार अर्थात सदगुणोंको गुणा करना अर्थात् बढाना एवं दोषोंका भागफल अर्थात् दोषोंको घटाना । संस्कार करना अर्थात् अच्छी आदतें लगाना एवं बुरी आदतें…

सायंकालके समय (दीया जलानेके समय) यह अवश्य करें !

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        गोधूलीके समय पंछी घोंसलेमें लौटने लगते हैं । इस समय बालकोंको खेलना रोककर घर लौटना चाहिए । घर लौटनेपर दूरदर्शनके कार्यक्रम न देखें; अपितु हिंदु संस्कृतिमें बताए अनुसार निम्नलिखित कृत्य करें । १.    हाथ-पैर एवं मुंहको स्वच्छ धोएं । २.    घरके वयोवृद्ध सदस्योंके साथ, पूजाघरमें देवताके समक्ष दीया एवं उदबत्ती जलाकर तथा हाथ जोडकर निम्नलिखित श्लोक कहें । शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यं धनसंपदाम् ।शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते ।।अर्थ : दीपकज्योति शुभ एवं कल्याण करती है तथा स्वास्थ्य और धनसंपदा प्रदान करती है । शत्रूबुद्धिका अर्थात् द्वेषका नाश करती है इसीलिए हे दीपज्योति, आपको  नमस्कार करते हैं । ३.    तदुपरांत आरती एवं प्रार्थना कर स्तोत्र-पठन करें । ४.    बडोंको नमस्कार कर उनसे आशीर्वाद लें । ५.    ककहरा (दिन, तिथि, हिंदु मास, नक्षत्र, पहाडे आदि रटना) कहें ।

ॐ जीवन एक गूँज है ॐ

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ॐ जीवन एक गूँज है ॐ
एक छोटा बच्चा अपनी माँ से नाराज होकर चिल्लाने लगा मे तुमसे नफरत करता हूँ उसके बाद वह फटकारे जाने के डर से घर से भाग गया वह पहाड़ियों के पास जाकर चीखने लगा मै तुमसे नफरत करता हूँ और वही आवाज पहाड़ों मे गूँज ने लगी उसने जिंदगी मे पहली बार कोई गूँज सुनी थी वह डर कर बचाव के लिये माँ के पास भागा और बोला घाटी मे एक बुरा बच्चा है जो चिल्लाता है मे तुमसे नफरत करता हूँ उसकी माँ समझ गई औ...र उसने अपने बेटे से कहा कि वह पहाड़ी पर जा कर फिर चिल्ला कर कहै मै तुम्हें प्यार करता हूँ और बच्चे ने ऐसा ही किया ओर वही आवाज गूँजी इस घटना से बच्चे को एक सीख मिली हमारा जीवन एक गूँज की तरह है हमें वही वापस मिलता है जो हम देते है जब आप दूसरों के लिये अच्छे बन जाते हो तो खुद के लिये और भी बेहतर बन जाते हो हरी ॐ!

Yss Presented Drama on Brahmcharya and our culture 19Feb12 Nashik

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Narayan sai worshiped Bapuji on MPPD 14Feb12 Sendhwa(MP) Part-1

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Yss Presented Drama on Brahmcharya and our culture 19Feb12 Nashik

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